मुज़फ़्फ़रनगर के बुज़ुर्ग उस्ताद शायर हज़रत उस्मान आदिलؔ का इंतिक़ाल
उस्तादुश्शोअरा की वफ़ात से अदबी हल्क़ों में सोग की लहर, नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद क़ब्रिस्तान खालापार में सुपुर्द-ए-ख़ाक
मुज़फ़्फ़रनगर, 2 सितम्बर (डॉ तनवीर गौहर)
मुज़फ़्फ़रनगर के मारूफ़ बुज़ुर्ग शायर, अद़ीब और उस्तादुश्शोअरा हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब तवील अलालत के बाद इतवार, 30 अगस्त 2026 को मुज़फ़्फ़रनगर में इंतिक़ाल कर गए। उनकी उम्र तक़रीबन 91 बरस थी। उनके इंतिक़ाल की ख़बर मिलते ही मुज़फ़्फ़रनगर और अत़राफ़ के अदबी, समाजी और शायरी के हल्क़ों में रंजो-अलम की लहर दौड़ गई। मरहूम की वफ़ात को अहले-अदब ने उर्दू शेरो-सुख़न के लिए एक बड़ा नुक़सान क़रार देते हुए उनकी अदबी और शायरी की ख़िदमात को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया।
हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब की नमाज़-ए-जनाज़ा 30 अगस्त को बाद नमाज़-ए-इशा बाग़ वाली मस्जिद में अदा की गई, जिसमें बड़ी तादाद में अहले-ख़ाना, अज़ीज़ो-अक़ारिब, अहबाब, शोअरा, अद़बा और मुख़्तलिफ़ शोबों से ताल्लुक़ रखने वाले अफ़राद ने शिरकत की। नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद उन्हें क़ब्रिस्तान खालापार में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।
कई नस्लों के शोअरा के उस्ताद

हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब न सिर्फ़ ख़ुद एक साहिब-ए-तर्ज़ शायर थे, बल्कि शेरो-सुख़न की बारीकियों, ज़बान-ओ-बयान और फ़न्नी नज़ाकतों पर गहरी नज़र रखते थे। यही वजह थी कि मुज़फ़्फ़रनगर और अत़राफ़ के मुतअद्दिद शोअरा उनसे मशवरा-ए-सुख़न किया करते थे और उन्हें अपना रहनुमा और उस्ताद तस्लीम करते थे।
मशहूर शायर और हफ़्त रोज़ा ‘‘तनवीर-ए-अदब’’ के मुदीर डॉक्टर तनवीर गौहर और मारूफ़ शायर अहमद मुज़फ़्फ़रनगरी भी हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब के शागिर्दों में शामिल हैं। इनके अलावा भी मुतअद्दिद शोअरा-ए-किराम उनकी इल्मी और अदबी रहनुमाई से मुस्तफ़ीद होते रहे। वह शोअरा के कलाम की इस्लाह के साथ-साथ उन्हें शायरी के फ़न्नी उसूलों और ज़बान-ओ-बयान की नज़ाकतों से रूशनास कराते थे।
चरत्थावल में पैदाइश, मेरठ में तालीम और आग़ाज़-ए-शायरी
हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर के तारीख़ी क़स्बा चरथावल में पैदा हुए। बचपन ही में उनके वालिदैन हिजरत करके मेरठ जा बसे, जहाँ उनकी इब्तिदाई ज़िंदगी और तालीम-ओ-तरबियत का अहम हिस्सा गुज़रा। उन्होंने मेरठ के फ़ैज़-ए-आम इंटर कॉलेज से तक़रीबन 1960 के आस-पास इंटरमीडिएट का इम्तिहान पास किया।
सरज़मीन-ए-मेरठ ही में उनके शायरी के ज़ौक़ ने बाक़ायदा सूरत इख़्तियार की और उन्होंने शेरगोई का आग़ाज़ किया। शायरी के इब्तिदाई दौर में उनका तख़ल्लुस ‘‘दिल’’ था, ताहम बाद में बैय्नुल-अक़वामी शोहरतयाफ़्ता शायर हज़रत हफ़ीज़ मेरठीؔ के मशवरे पर उन्होंने अपना तख़ल्लुस तब्दील करके ‘‘आदिल’’ इख़्तियार कर लिया। हफ़ीज़ मेरठीؔ ही हज़रत उस्मान आदिलؔ के शायरी के उस्ताद भी थे। यूँ उनकी शायरी की तरबियत एक ऐसे उस्ताद के ज़ेरे-साया हुई, जो ख़ुद उर्दू शायरी में एक मुमताज़ मक़ाम रखते थे।
मेरठ से मुज़फ़्फ़रनगर आमद
तक़रीबन चार दहाइयों क़ब्ल हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब ने मेरठ से हिजरत करके मुज़फ़्फ़रनगर को अपना मुस्तक़िल मसकन बनाया। उन्होंने मुज़फ़्फ़रनगर में नोजल का कारख़ाना क़ायम किया और मोहल्ला खालापार, गहरा बाग़ के सामने अपना मकान तामीर करके मुस्तक़िल सुकूनत इख़्तियार कर ली।
मुज़फ़्फ़रनगर में क़ियाम के बाद उन्होंने यहाँ की अदबी और शायरी की सरगर्मियों में भरपूर हिस्सा लिया और शहर के मुख़्तलिफ़ अदबी हल्क़ों से उनके गहरे रब्त-ओ-ज़ब्त क़ायम हुए। उनकी शाइस्ता तबीयत, इल्म-ओ-अदब से वाबस्तगी, ख़ुश-अख़लाक़ी और शोअरा की रहनुमाई के जज़्बे ने उन्हें अदबी हल्क़ों में एक मुमताज़ मक़ाम अता किया।
मुज़फ़्फ़रनगर के मारूफ़ शायर डॉक्टर सदाक़त देवबंदी का शुमार भी हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब के क़रीबी रुफ़क़ा में होता है। दोनों के दरमियान अदबी और शायरी के ताल्लुक़ के साथ-साथ दैरिना दोस्ताना मरासिम भी क़ायम रहे। मुज़फ़्फ़रनगर के अदबी हल्क़ों में हज़रत उस्मान आदिलؔ की महफ़िलें शेरो-सुख़न के हवाले से ख़ास अहमियत रखती थीं, जहाँ शोअरा अपने कलाम की इस्लाह और फ़न्नी रहनुमाई के लिए उनसे रुजू किया करते थे।
अहले-ख़ाना और शागिर्दों का सोग
हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब अपने पीछे छः बेटों और बेटियों, पोते-पोतियों, नवासे-नवासियों और दीगर अहले-ख़ाना पर मुश्तमिल एक भरे-पूरे ख़ानदान को सोगवार छोड़ गए हैं। उनके इंतिक़ाल से जहाँ अहले-ख़ाना एक शफ़ीक़ बुज़ुर्ग और सरपरस्त से महरूम हो गए, वहीं अदबी दुनिया ने एक तजुर्बेकार शायर, साहिब-ए-ज़ौक़ सुख़नशनास और उस्तादुश्शोअरा को खो दिया।
हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब की ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा शेरो-अदब की ख़िदमत, शोअरा की रहनुमाई और अदबी ज़ौक़ की आबीआरी में गुज़रा। उनकी वफ़ात के बाद उनके शागिर्दों, अहबाब और मुतअल्लिक़ीन की जानिब से ताज़ियत का सिलसिला जारी है और अदबी हल्क़ों में उनकी ख़िदमात को याद करते हुए उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया जा रहा है।
हज़रत उस्मान आदिलؔ के चंद मशहूर अशआर
अब से पहले मेरा ये हाल न था
ग़म का मक़रूज़ बाल-बाल न था
दुनिया जिसका जवाब देती रही
मेरी आँखों में वो सवाल न था
साथ रहकर भी अजनबी ही रहा
हमसफ़र था वो हमख़याल न था
मोमबत्ती से इबारत है हमारी ज़िंदगी
जो हमेशा जलती, घुलती और घटती ही रही
छाँव आँगन में बहुत थी लेकिन इक आकाश-बेल
पेड़ पर आहिस्ता-आहिस्ता लिपटती ही रही
मैं हूँ आदिल मेज़ पर रक्खी हुई ऐसी किताब
बे-पढ़े दुनिया वरक़ जिसके पलटती ही रही
बरगद का पेड़ आज भी यूँ तो है गाँव में
लेकिन तेरे बग़ैर झुलसता हूँ छाँव में
रात को कह दूँ रात नहीं है
मेरे बस की बात नहीं है
हफ़्त रोज़ा ‘‘तनवीर-ए-अदब’’ मुज़फ़्फ़रनगर हज़रत उस्मान आदिलؔ साहब के इंतिक़ाल पर गहरे रंजो-ग़म का इज़हार करता है और दुआगो है कि अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए, उन्हें जवार-ए-रहमत में जगह अता फ़रमाए और तमाम पसमानदगान, अहले-ख़ाना, शागिर्दों और मुतअल्लिक़ीन को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन।

