मेरिट अवार्ड: एक ख़ूबसूरत तालीमी रिवायत: डॉ तनवीर गौहर

किसी भी क़ौम और मुआशरे की तरक़्क़ी का सबसे मज़बूत और पाएदार रास्ता तालीम है। मआशी ख़ुशहाली, समाजी बेदारी, शऊर, तहज़ीब और बेहतर मुस्तक़बिल की बुनियाद तालीम ही के ज़रिए मज़बूत होती है। इसी लिए जो मुआशरे अपने बच्चों की तालीम को तरजीह देते हैं, वो वक़्त के साथ तरक़्क़ी की मंज़िलें तय करते हैं।

हाल ही में मुस्लिम तेली मलिक एकता मंच, मुज़फ़्फ़रनगर की जानिब से मुनअक़िद की गई मेरिटोरियस अवार्ड तक़रीब इसी सिम्त एक क़ाबिले-तहसीन क़दम है, जिसमें 70 फ़ीसद से ज़्यादा नंबर हासिल करने वाले होनहार तलबा व तालिबात को एज़ाज़ात से नवाज़ कर उनकी हौसला-अफ़ज़ाई की गई। बज़ाहिर ये एक तक़रीब है, लेकिन इसके असरात इससे कहीं ज़्यादा वसीअ हो सकते हैं। एक तालिब-ए-इल्म को मिलने वाला एज़ाज़ सिर्फ़ उसकी मेहनत का एतराफ़ नहीं होता बल्कि दूसरे बच्चों के लिए भी मेहनत, मुक़ाबले और कामयाबी की एक रौशन मिसाल बन जाता है।

ऐसी तक़ारीब का सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि बच्चों में ये एहसास पैदा होता है कि उनकी तालीमी कामयाबी को मुआशरा क़द्र की निगाह से देखता है। वालिदैन भी अपने बच्चों की तालीम की तरफ़ ज़्यादा तवज्जो देते हैं और तलबा में आगे बढ़ने का जज़्बा पैदा होता है।
इस एजाज़ी तकरीब को कामयाब बनाने में जिन्होंने दिन रात मेहनत की उनमें डॉ.जमील मलिक, गुलबहार मलिक एड, डॉ. शमीम मलिक, असगर मलिक, मनव्वर मलिक, डॉ. रहमत मलिक, आसिफ मलिक, नफीस मलिक, अकरम मलिक, वसीम मलिक, मेहरबान मलिक, साजिद मलिक, नाजिश मलिक, हाजी इनाम, नदीम मलिक, बल्लू दीवान, इरफान मलिक, हाजी इस्लाम, हाजी गुलजार, मासूम ठेकेदार, बाबू मलिक, शहजाद मलिक, शमशाद मलिक, खालिक मलिक, रियासत मलिक, पप्पू दीवान आदि के नाम शामिल हैं। इन सभी को में अपनी जानिब से दिली तहनियत और मुबारकबाद पेश करता हूं।

मैं समझता हूँ कि इस तरह की मुस्बत कोशिश सिर्फ़ एक बिरादरी तक महदूद नहीं रहनी चाहिए। मुल्क की हर बिरादरी, हर तंज़ीम और हर समाजी इदारे को चाहिए कि वो अपने होनहार तलबा व तालिबात की हौसला-अफ़ज़ाई के लिए मेरिट अवार्ड, स्कॉलरशिप, तालीमी सेमिनार और कैरियर गाइडेंस जैसे प्रोग्राम मुनअक़िद करे। इससे तालीम का माहौल मज़बूत होगा और नौजवान नस्ल में मुक़ाबले का सेहतमंद जज़्बा पैदा होगा।

अलबत्ता ऐसे प्रोग्रामों में एक बात का ख़ुसूसी ख़याल रखना भी ज़रूरी है कि एज़ाज़ात इम्तिहानी नंबरों की बुनियाद के अलावा भी मआशी तौर पर कमज़ोर मगर सलाहियत रखने वाले तलबा, मुख़्तलिफ़ शोबों में नुमायाँ कारकर्दगी दिखाने वाले नौजवानों और ग़ैर-मामूली सलाहियत रखने वाले बच्चों को मुनासिब मौक़े फ़राहम किए जाएँ।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को सिर्फ़ डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी अफ़सर बनाने का ख़्वाब न दिखाएँ, बल्कि उन्हें अच्छा इंसान, ज़िम्मेदार शहरी और बासलाहियत फ़र्द बनाने पर भी तवज्जो दें। तालीम का मक़सद सिर्फ़ रोज़गार हासिल करना नहीं बल्कि इंसान में शऊर, बर्दाश्त, अख़लाक़ और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ का जज़्बा पैदा करना भी है।

मुस्लिम तेली मलिक एकता मंच की जानिब से होनहार तलबा की पज़ीराई एक मुस्बत रिवायत की बुनियाद बन सकती है। अगर इसी तरह मुल्क की तमाम बिरादरियाँ और समाजी तंज़ीमें तालीम के फ़रोग़ को अपना मिशन बना लें तो हमारे मुआशरे में एक सेहतमंद तालीमी मुक़ाबले की फ़ज़ा क़ायम हो सकती है।

आज किसी बच्चे की हौसला-अफ़ज़ाई दरअसल कल के एक रौशन मुस्तक़बिल की तामीर है।

तालीम के मैदान में की जाने वाली हर मुस्बत कोशिश क़ाबिले-तहसीन है, ख़्वाह वो किसी भी बिरादरी, तंज़ीम या इदारे की जानिब से हो। हमें इख़्तिलाफ़ात से बालातर होकर अपने बच्चों के मुस्तक़बिल के लिए मुत्तहिद होना होगा, क्योंकि एक तालीम-याफ़्ता नस्ल ही मज़बूत, बा-शऊर और तरक़्क़ीयाफ़्ता मुआशरे की ज़मानत है।

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