ग़ज़ल
मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ां
तेरी जुरअत-ए-जुनूँ से मेरे इश्क़-ए-बेकराँ तक
मेरी दास्ताँ चलेगी अभी तेरी दास्ताँ तक
गुल-ए-सुर्ख़ रू की ख़ुशबू लो पहुँच गई ख़िज़ाँ तक
चली आई फिर भटक कर ये हमारे गुल्सिताँ तक
ये ख़िराज-ए-सरफ़रोशी ये जुनूँ की गर्मजोशी
रहें बाल-ओ-पर सलामत है इरादा आसमाँ तक
मेरे दिल को रग़बतों के ये फ़रेब दे रही है
जो है गर्दिश-ए-मुसलसल ये क़फ़स से आशियाँ तक
ये थी आतिश-ए-तअस्सुब न बुझी बुझाए लेकिन
जो चले थे हम बुझाने जला बैठे उँगलियाँ तक
मुझे यूँ अना ने लूटा कि हैं दोनों हाथ ख़ाली
जो था मेरे दिल में पिनहाँ वो न आ सका ज़ुबाँ तक
मेरे हौसलों ने छोड़े जो निशान रास्तों पर
तो चमक उठी हैं राहें कि है नूर हर निशाँ तक
है जो ख़्वाहिश-ए-रफ़ाक़त तो ये ग़ौर कर ले पहले
मेरे साथ चल सकेगा तेरा हौसला कहाँ तक
रहे भी तो कैसे “मुमताज़” अब अंधेरा नफ़रतों का
मेरे प्यार की तजल्ली है ज़मीं से कहकशाँ तक

